Harish Jharia

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14 December 2012

eNovel: Patthar Kii Ibaarat (Script of Stone) Episode- 14


Exclusively written for “Discover Life”
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Copyright © 2012 [Harish Jharia] All Rights Reserved
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उपन्यास: पत्थर की इबारत (एपीसोड- 14)

© हरीश झारिया

पिछले भाग की अंतिम पंक्तियाँ… 
"पूनों घायल मृग शावक को देखने आई थी"... यह जानकार परमा का काल्पनिक स्वप्नलोक एकाएक चूर-चूर हो गया. उसे यह भी संदेह होने लगा कि संभवतः सरदार मिरागा बीर ने ही उसे घायल मृग पर चल रहे उपचार का मूल्यांकन करने का प्रशासनिक कार्य सौंपा होगा. परमा को इस बात का गंभीर आघात भी लगा कि पूनों ने पहली मुलाक़ात पर ही उसकी पूर्ण उपेक्षा कर दी और उसकी ओर देखा तक नहीं. 

संभावित उपेक्षा की आशंका से उसका मन क्षोभ से भर गया. उसने अपना धनुष उठाया और अड़िया हटा कर घर के आहाते से बाहर निकल गया. प्रवेशद्वार के बाहर पूनों के घुड़सवार अंगरक्षक अड़िया को घेरे चौकन्ने खड़े हुए थे. परमा को आता देख उन्होंने  उसे सुरक्षित रास्ता दे दिया. सुरक्षा घेरे के बाहर आकार परमा ने बुदनी नदी की दिशा में घाट के ढाल की ओर देखा और भूरा की तलाश में आगे बढ़ गया.

और आगे…
परमा की माई नौनी, सरदार की बेटी पूनों के आगमन से रोमांचित हो उठी थी. अपने घर में पूनों के आने का अभिप्राय जानकार तो उसका मन गद्-गद् हो गया. वह पूनों के निकट पहुंच कर जैसे ही रुकी, वैसे ही पूनों आकर उससे लिपट गई. नौनी ने भाव-विभोर होकर पूनों को अपनी बाहों में भर लिया और भरे गले से बोली-
“अच्छी आ गई री, पुनिया. मोहे तो बिसवास-ई नईं हो रहो है अपनी आखों पै... अरी..! कैसे आन दओ तोहे मिरगा बीर नै..?”

नौनी ने पूनों का चेहरा अपने हाथों में भर लिया और उसके गुलाबी कपोलों और नीली आँखों को निहारने लगी. पूनों के सुनहरे बाल तीसरे पहर की हलकी बयार के साथ उड़-उड़ कर उसके कन्धों पर बिखरने लगे थे. पूनों के मुलायम गालों का स्पर्श और सुनहरे बालों के सौंदर्य ने नौनी को मंत्रमुग्ध कर दिया. 

मगर अपने अदभुत सौंदर्य से अनजान किशोरी पूनों जीवन के पहले स्वातंत्र्य मात्र को अनुभव कर अपने होशो-हवास खो बैठी थी. नौनी के हाथों को थामे हुए वह अपने पंजों पर ही उछलने लगी और ऐसी स्तिथि में ही उसके चारों ओर घेर-चक्कर घूमने लगी. नौनी भी उसकी अठखेलियों में सहयोग देते हुए उसे अपने चारों ओर देर तक घुमाती रही. पूनों ने लगभग चिल्लाते हुए नौनी के प्रश्नों का उत्तर दिया-
“अरी काकी..! मोहे हिरन को बच्छा देखनें हतो... ओहे छीनें हतो... और ओके संगें खेलनें हतो. तो, मैंनें बीर सें पूछी... फिर, बीर नै कही चली जा... तो मैं आगई...”

किर एकाएक वह रुक कर खडी हो गई और कमर पर दौनों हाथ रख, सर झटकाती हुई बोली-
“काय री काकी, एक बात तो बता... जो परमा इत्तो गुस्सैला काय है..? ना बात, ना चीत... भुन-भुनात भओ चलो गओ.” 

इतना कह कर पूनों ने घूम कर प्रवेश द्वार की ओर देखा, जहां पहरे पर तैनात उसके अंग-रक्षकों के बीच से परमा पैर पटकते हुए, लंबे-लंबे डग भरता हुआ नदी की ओर बढ़ा जा रहा था. उसने परमा पर फब्ती कसी-
“ है..! गर्रैला कहूँ को...”

किशोरी पूनों द्वारा परमा के लिए ‘गर्रेला’ अर्थात ’अड़ियल’ का संबोधन सुनकर नौनी को जोर की हँसी छूट पड़ी, जिसे रोकने के लिए उसने दौनों हाथों से अपना मुंह ढँक कर लिया. तब तक उसकी बेटी बिन्नी भी वहाँ पहुँच गई थी और पूनों की बात सुनकर, अपनी माई के पैरों से लिपटकर खिलखिलाकर हंसने लगी. कोदू भी अपनी मुस्कराहट नहीं रोक पाया. उसने घर की ओर रुख किया और नपे-तुले कदमों से आगे बढ़ गया.   

नौनी ने पूनों का हाथ थामा और उसे साथ लिए हुए कोदू के पीछे-पीछे चल पडी. एक पल में ही कोदू, नौनी और पूनों के चलने की रफ़्तार तेज हो गई और बालिका बिन्नी उनके साथ दौड़ने लगी. बिन्नी, कबीले की अपूर्व सुन्दरी पूनों के आगमन के कारण बहुत उत्तेजित थी और वह लगातार उसके के निकट बनी रहने का प्रयास कर रही थी. नौनी ने बेटी के सरपर हाथ फिराते हुए कहा- 
“बिटिया री..! तन्नक दौड के जा और सकला निकार के ले आ... भूंज के पूनों हे खिलेहें”  

बिन्नी को भी सकला अर्थात शकरकंद बहुत पसंद थे. सकला का नाम सुनते ही उसके मुंह में पानी भर आया. वह दौड कर घर के दरवाज़े पर गई और मलगा पकड़ कर पैरों सहित अपने शरीर को ऊपर उठाया और अण्डाकार दरवाज़े से घर के भीतर कूद गई. 

नौनी ने देखा कि उसका पति कोदू घर की दीवार के साथ टिक कर नीचे पक्के फर्श पर बैठ गया था. उसने दाहिना पैर आगे की ओर फर्श पर फैलाया, दुसरे को सिकोड़कर घुटना ऊपर उठाया और बांया हाथ आगे की ओर फैला कर उस घुटने पर टिका लिया. 

नौनी सरदार की बेटी पूनों को साथ लिए हुए रसोई के अलाव के नजदीक पहुँच गई. उसने पूनों को एक चौकोर पत्थर की चौकी पर बिठा दिया और खड़ैरा की सहायता से से अलाव के आस-पास की राख को हटा कर चौका साफ़ करने लगी. 

तभी बिन्नी घर के अण्डाकार दरवाज़े से कूदकर बाहर आ गई. उसके बाँए कंधे से बांस की जालीदार डोली लटक रही थी जिसमें आठ-दस लाल और सफ़ेद शकरकंद रखे हुए थे. दरवाज़े से कूदते ही वह रसोई की ओर दौड़ पड़ी. बिन्नी को देखकर माई नौनी ने हाथ आगे बढ़ाया और डोली बेटी के हाथ से ले कर उसे ज़मीन पर उलट दिया. फिर एक-एक शकरकंद उठाकर अलाव के अंगारों पर जमाने लगी. 

पत्थर की चौकी पर बैठी हुई पूनों अपने स्वागत की गतिविधियों का ध्यानपूर्वक अवलोकन कर रही थी. अंगारों पर भूनते हुए शकरकन्द की मधुर सुगंध से उसके मुंह में पानी आ गया.  उसने अपने दौनों पैर सिकोड़ कर चौकी के नजदीक समैंट लिए और पंजों के ऊपर अपने हाथों को लपेट लिया था. उसके लंबे सुनहरे बाल कन्धों को ढंकते हुए पीछे की ज़मीन तक पहुंचकर बिछ गए थे.  

बालिका बिन्नी की नज़र एक पल के लिए भी पूनों से नहीं हट रही थी. वह अपनी माई नौनी से सटकर खडी, भुनते हुए शकरकंदों को देखती हुई नज़र आने की कोशिश कर रही थी, मगर उसका पूरा ध्यान पूनों के चेहरे और लंबे सुनहरे बालों पर लगा हुआ था. रह-रह कर उसकी आँखें नौनी पर ही जा टिकती थीं. वह दौनों हाथों की मुठ्ठियों को वक्ष पर बांधे हुए धीरे-धीरे पैर सरकाती हुई पूनों के ठीक पीछे पहुँच गई और उसके बालों को आश्चर्य पूर्वक देखने लगी जो धरती पर उगी हरी दूब पर बिछे हुए थे.    

दिन का तीसरा पहर ढल रहा था. जंगल के ऊंचे-ऊंचे पेड़ों की छायाएं ज़मीन पर दूर-दूर तक फैलने लगी थीं. वातावरण में अंगारों पर भुनते हुए शकरकंदों की खुशबू फैली हुई थी. नौनी ने एक भुना हुआ सकला पूनों की ओर बढ़ाया तो सरदार की बेटी ने भी उसे झट से थाम लिया. गरम शकरकंद को वह अपनी हथेली पर आगे-पीछे लुढ़काते हुए ठंडा करने लगी. 

तभी घर के प्रवेश द्वार पर कुछ हलचल सी हुई जिसे महसूस कर पूनों सहित वहाँ उपस्थित सभी लोग प्रवेशद्वार की अड़िया की ओर एकसाथ मुड़कर देखने लगे. उनकी उत्सुकता से यही प्रतीत हो रहा था कि उस पल की सबसे अधिक अपेक्षित घटना घायल मृग के साथ भूरा की वापसी थी जिसकी हर किसी को प्रतीक्षा थी. 

अड़िया के बाहर जंगल के उंचे-ऊंचे वृक्षों की कतार फैली हुई थी. कबीले के ढोर-बछेरू एक विशाल काफिले में जंगल के चारागाह से वापस लौट रहे थे. गोधूली के समय ऊंचे-ऊंचे धूल के गुबार उठ रहे थे और चरवाहों की हे-हे और टिर्र-टिर्र की आवाजें वातावरण में गूँज रही थीं. सभी की नज़रें अडिया पर लगी हुई थीं, कि एकाएक घायल मृग को कंधे पर लादे हुए भूरा धूल के गुबार में से  प्रकट हुआ. 

उसपर दृष्टि पड़ते ही कोदू उठ खड़ा हुआ और दौनों हाथ कमर पर रखकर भूरा की ओर देखने लगा जो प्रवेश द्वार के अडिया को पार कर रहा था. उसके ठीक पीछे उसे परमा भी नज़र आया जिसने भूरा के हाथ से अडिया थाम लिया था और उसे प्रवेश करने में सहायता कर रहा था. 

आहाते के भीतर आते ही भूरा लंबे-लंबे डग भरता हुआ शीघ्र ही कोदू के नजदीक नीम के पेड़ के नीचे पहुंच गया और घायल मृग को सावधानी पूर्वक धरती पर उतार दिया. नीचे उतरते ही मृग चारों पैरों पर खड़ा हो गया तो कोदू के मुख पर हलकी सी मुस्कराहट फ़ैल गई. उसने भूरा को जाने का सांकेतिक आदेश दिया तो भूरा ने निकट ही रखे अपने शस्त्र उठाए और कमरपट्टा कमर पर कस लिया और चुप-चाप आहाते से बाहर निकल गया. 

मृग के स्वास्थ्य में प्रगति से प्रसन्न होकर कोदू ने दौनों हाथ ऊपर उठाए और अंगड़ाई लेते हुए आकाश की ओर देखा. सूर्य क्षितिज की ओर ढलता जा रहा था मगर डूबने में अभी काफी समय शेष था. उसने घूम कर पूनों की ओर देखा जो खडी होकर सकला का अंतिम टुकड़ा मुंह में डाल रही थी और नौनी के साथ आने की प्रतीक्षा कर रही थी. 

नौनी ने भुने शकरकन्द आग से उठाकर बांस की डोली में डाले ओर पूनों का हाथ थाम कर घायल मृग की ओर चल पड़ी. उसने बांस की डोली कोदू के सामने धरती पर रख दी और पूनों को लेजाकर मृग के निकट लाकर छोड़ दिया. 

पूनों मृग को देख कर बच्चों की भांति मचल गई और ताली बजा-बजा कर अपने पंजों पर उछलने लगी. उसने मृग को छूकर देखा, फिर घुटनों के बल धरती पर बैठ गई और उसके सर को अपनी दौनों हथेलियों में लेकर हिरन की आँखों को ध्यान से देखने लगी. उसने मृग को अपनी बाहों में समेंट लिया और उसके घाव को छूकर देखने लगी जिसपर लिपटी हरे रंग की  जड़ी-बूटियाँ सूख कर एक सख्त आवरण में परिवर्तित हो गई थी. उसने मृग को हरी ताज़ी दूब खिलाने का प्रयास किया जिसे उसने अस्वीकार कर दिया क्योंकि वह थोड़ी देर पहले ही नदी से भरपेट पानी पीकर आया था. पूनों देर तक हिरन को भिन्न-भिन्न प्रकार से दुलारती रही. ऐसा लग रहा था जैसे कि उसे वापस अपने घर जाने का होश ही नहीं था. 

कोदू एक क्षण आसमान की ओर देखकर समय का अंदाजा लगाता और दूसरे क्षण सरदार की बेटी की ओर देखकर चिंतित हो जाता जो नन्हे मृग का साथ पाने के बाद सब कुछ भूल बैठी थी. कोदू को चिंतित देखकर उसकी पत्नी नौनी ने उससे इशारे में उसकी चिंता का कारण पूछा. कोदू ने भी इशारे में ही उससे कहा कि देर हो रही है... पूनों को तत्काल ही सरदार की बाखर में लौट जाना चाहिए. नौनी ने निराशा से अपना माथा ठोक लिया जैसे कह रही हो कि- “ उफ़..! ये पुरुष भी कैसे होते हैं”

नौनी को बरबस हँसी आ गई. वह पूनों के निकट पहुंची और बोली-
“ए री मोड़ी..! तोहे बाखार नईं जाने है का..? अरी बिटिया मिरगा बीर हमारो टेंटुआ दबा दे है... चल-चल बेटा... चल.”

ऐसा कह कर नौनी ने मुस्कुराकर अपना हाथ पूनों की ओर बढ़ाया तो उसने भी तत्काल उसे थाम लिया और उठकर नौनी से सटकर खडी हो गई. नौनी ने चलने का संकेत किया तो वह उसके साथ खुशी-खुशी प्रवेश द्वार की ओर चल पड़ी. दौनों तेज़ी से अडिया की ओर बढ़ गए. 

पूनों ने कनखियों से रास्ते के किनारे खड़े परमा की ओर देखा तो रोमांच से परमा का चेहरा तमतमा कर लाल हो गया. उसके हाथ से धनुष फिसलते-फिसलते रह गया और बड़ी मुश्किल से उसने अपने होशो-हवास काबू में किए. उसने घूमकर अपने पिता कोदू की ओर देखा जैसे कि पूछ रहा हो कि “बीर, मैं उनके साथ जाऊं या नहीं.” 

कोदू भी बेटे की ओर बड़ी देर से ध्यान पूर्वक देख रहा था और उसके पल-पल बदलते हाव-भाव में यौवन के प्रवेश की आहट सुन रहा था. जैसे ही परमा ने प्रश्नवाचक भाव से उसकी ओर देखा तो कोदू ने जोर देकर कहा-
“अरे मोड़ा, इते काए देख रहो है..? अरे जल्दी जा और पूनों हे छोड़ कै आ...”

परमा खुशी से पागल सा हो गया. उसने सर घुमा कर देखा तो तब तक काफी देर हो चुकी थी. पूनों प्रवेश द्वार का अडिया पार करके अंगरक्षकों के बीच पहुँच चुकी थी. देखते ही देखते वह उछल कर घोड़े पर सवार हुई और उसने घोड़े को एड़ लगा दी. परमा तेज़ी से भागकर अडिया तक पहुंचा. परन्तु जब तक वह वहाँ पहुंचता, तब तक पूनों अपने अंगरक्षकों सहित रवाना हो चुकी थी. परमा अपनी माई नौनी के साथ अडिया कि बाहर खड़ा पूनों के घुड़सवार दस्ते को जाते हुए देखता रह गया. उसकी नज़र उनपर तब तक टिकी रही जब तक कि वे धूल के गुबार के पीछे विलीन नहीं हो गए. 

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... शेष अगले अंक में क्रमशः
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Synonyms: गुबार= strom; डग= step; अंगड़ाई= stretching body; घुड़सवार= horse mounted; भाव-विभोर= emotional; टेंटुआ= throat; तत्काल= immediate; छीनें हतो= wanted to touch; गर्रैला= stubborn; गुस्सैला= short tempered; सकला= शकरकंद, sweet potato; क्षोभ= commotion, agitation; खड़ैरा= सूखी झाडी की पतली लकडियों से बना मोटा झाडू, coarse broom made of twigs of dried bush; अंगिया- blouse; बाड़े / बाड़ा= आहाता, आशंका= fear; compound, fence; अड़िया= crude gate made of a wood log placed horizontally on two supports; खदेड़= drive away; माँसपेशियाँ= muscles; खरौंच= scratch; प्रत्यंचा= bow string; कुल्हाड़ी= axe; मूठ= long wooden handle; घुटनों= knees; हूबहू= identical; मृगछौने= calf of a deer; अड़ियों= crude wooden gates; प्रयोजन= purpose; गतिविधियाँ= activities; तमाशा= stunt; किशोरावस्था= adolescence; झुंडों= herd; सरफूंद= french knot; अंगोछे= scarf; हँसिया= sickle; बिरौनियों= eye leshes; बयार= breeze; मलगा= wooden log; झिरिया= cascade; अंजुली= handful; डकार= burp; शल्यक्रिया= surgery; जड़ी-बूटियों= hurbs; अपराधबोध= guilt; मलगा= wood log; कल्ला= मिट्टी का तवा, terracotta griddle, terracotta hotplate; मूड़= सर, head; अलाव= bonfire; खूटों= baton; मूड़= head; नियंत्रण= Control; सूरज= the sun; आँच= heat; शिकायत= complaint; शिकार= prey, hunt; बाखर= sprawling royal residential complex; गाय-बकरी= domesticated animals like cow and goat;
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Links to Episodes of “Patthar Kii Ibaarat”:
Opening Page:  Preface:  Introduction:  Episode-1:  Episode-2:  Episode-3:  Episode-4:  Episode-5:  Episode-6:  Episode-7:  Episode-8:  Episode-9: Episode-10: : Episode-11: Episode-12: Episode-13; Episode-14
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अगला एपीसोड शीघ्र ही आ रहा है...
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npad
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1 December 2012- 14 December 2012
Words- 2043  

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